दक्षिण भारत के एक गरीब निरक्षर फल बेचने वाले हरेकाला हजाब्बा ने सीमित संसाधनों के साथ जो कर दिखाया है वो राज्य सरकारें और कई संगठन अक्सर मिलकर भी नहीं कर पाते.
हरेकाला हजाब्बा ने फल की अपनी छोटी-सी दुकान से हुई आमदनी से पहले अपने गांव के बच्चों के लिए प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल बनवाया और अब एक विश्वविद्यालय बनवाने की तैयारी में हैं.
पचपन वर्षीय हजाब्बा कहते हैं, ''एक बार एक विदेशी ने मुझसे एक फल का नाम अंग्रेज़ी में पूछा तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैं निरक्षर हूं. मुझे नही पता था कि इसका क्या मतलब है.''
वो कहते हैं, ''तब मुझे ये ख्याल आया कि गांव में एक प्राइमरी स्कूल होना चाहिए ताकि हमारे गांव के बच्चों को कभी उस स्थिति से गुज़रना ना पड़े जिससे मैं गुज़रा हूं.''
स्थानीय लोग हरेकाला हजाब्बा की इस कोशिश के लिए उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते लेकिन हजाब्बा के लिए प्रशंसा से ज़्यादा ज़रूरी है वो मिशन जो उन्होंने शुरु किया है.
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